चम्पारन सत्याग्रह

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चम्पारन सत्याग्रह का प्रारम्भ राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के द्वारा किया गया था। अंग्रेज़ बाग़ान मालिकों ने चम्पारन के किसानों से एक अनुबन्ध करा लिया था, जिसमें उन्हें नील की खेती करना अनिवार्य था। नील के बाज़ार में गिरावट आने से कारखाने बन्द होने लगे। अंग्रेज़ों ने किसानों की मजबूरी का लाभ उठाकर पर लगान बढ़ा दिया। इसी के फलस्वरूप विद्रोह प्रारम्भ हो गया। महात्मा गाँधी ने अंग्रेज़ों के इस अत्याचार से चम्पारन के किसानों का उद्धार कराया। इसका परिणाम यह हुआ कि बिहार वालों के लिए वे देव तुत्य बन गये। यहाँ उनके साथ आन्दोलन में प्रमुख थे- राजेन्द्र प्रसाद, श्री कृष्ण सिंह, अनुग्रह नारायन सिंह, जनकधारी प्रसाद और ब्रजकिशोर प्रसाद।

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अंग्र्ज़ों का अत्याचार

चम्पारन के किसानों से अंग्रेज़ बाग़ान मालिकों ने एक अनुबंध करा लिया था। इस अनुबंध के अंतर्गत किसानों को ज़मीन के 3/20वें हिस्से पर नील की खेती करना अनिवार्य था। इसे 'तिनकठिया पद्धति' कहते थे। 19वीं शताब्दी के अन्त में रासायनिक रगों की खोज और उनके प्रचलन से नील के बाज़ार में गिरावट आने लगी, जिससे नील बाग़ान के मालिक अपने कारखाने बंद करने लगे। किसान भी नील की खेती से छुटकारा पाना चाहते थे। गोरे बाग़ान मालिकों ने किसानों की मजबूरी का फ़ायदा उठाकर अनुबंध से मुक्त करने के लिए लगान को मनमाने ढंग से बढ़ा दिया, जिसके परिणामस्वरूप विद्रोह शुरू हुआ।

'तिनकठिया प्रणाली' की समाप्ति

1917 ई. में चम्पारन के राजकुमार शुक्ल ने सत्याग्रह की धमकी दी, जिससे प्रशासन ने अपना आदेश वापस ले लिया। चम्पारन में गाँधी जी द्वारा सत्याग्रह का सर्वप्रथम प्रयोग करने का प्रयास किया गया। चम्पारन में गाँधी जी के साथ अन्य नेताओं में राजेन्द्र प्रसाद, ब्रजकिशोर, महादेव देसाई, नरहरि पारिख तथा जे. बी. कृपलानी थे। इस आन्दोलन में गाँधी जी के नेतृत्व में किसानों की एकजुटता को देखते हुए सरकार ने मामले की जाँच की।

जुलाई, 1917 ई. में 'चम्पारण एग्रेरियन कमेटी' का गठन किया गया। गाँधी जी भी इसके सदस्य थे। इस कमेटी के प्रतिवेदन पर 'तिनकठिया प्रणाली' को समाप्त कर दिया तथा किसानों से अवैध रूप से वसूले गए धन का 25 प्रतिशत वापस कर दिया गया। 1919 ई. में 'चम्पारण एग्रेरियन अधिनियम' पारित किया गया, जिससे किसानों की स्थिति में सुधार हुआ।


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